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ऑब्सेसिव-कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओ.सी.डी.) का निदान मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों द्वारा नैदानिक मूल्यांकन के माध्यम से किया जाता है। इस मूल्यांकन प्रक्रिया में आम तौर पर निम्नलिखित चरण शामिल होते हैं:nn1. नैदानिक साक्षात्कार: मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक रोगी के लक्षणों, ये लक्षण कब शुरू हुए, कितने समय से मौजूद हैं, और वे उनके दैनिक जीवन को कैसे प्रभावित कर रहे हैं, इसे विस्तार से समझने के लिए एक साक्षात्कार आयोजित करता है। इस साक्षात्कार में रोगी के विचारों, भावनाओं और व्यवहारों के बारे में जानकारी एकत्र की जाती है।nn2. लक्षण मूल्यांकन: ओ.सी.डी. के मुख्य लक्षणों, जैसे कि जुनूनी विचार (बार-बार आने वाले, अवांछित और परेशान करने वाले विचार, आवेग या छवियां) और बाध्यकारी क्रियाएं (इन जुनूनी विचारों से होने वाली चिंता को कम करने के लिए किए जाने वाले दोहराव वाले व्यवहार या मानसिक कार्य) की विस्तार से जांच की जाती है। निदान के लिए, ये लक्षण एक निश्चित अवधि के लिए मौजूद होने चाहिए और व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करना चाहिए।nn3. विभेदक निदान: ओ.सी.डी. के लक्षणों के समान लक्षण दिखाने वाले अन्य मानसिक विकारों (जैसे, सामान्यीकृत चिंता विकार, सामाजिक चिंता विकार, अवसाद, टिक विकार) और चिकित्सा स्थितियों को बाहर किया जाना चाहिए। यह एक उचित उपचार योजना बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।nn4. नैदानिक मानदंड: वर्तमान नैदानिक दिशानिर्देशों, जैसे कि मेंटल डिसऑर्डर के नैदानिक और सांख्यिकीय मैनुअल (डी.एस.एम.-5) में उल्लिखित ओ.सी.डी. के नैदानिक मानदंडों का उपयोग किया जाता है। इन मानदंडों के अनुसार, जुनूनी विचारों और बाध्यकारी क्रियाओं की उपस्थिति, उनके द्वारा व्यक्ति के समय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा लिया जाना, महत्वपूर्ण संकट या कामकाज में बाधा उत्पन्न करना, और किसी अन्य पदार्थ या चिकित्सा स्थिति के प्रत्यक्ष शारीरिक प्रभाव से संबंधित न होना आवश्यक है।nn5. यदि आवश्यक हो तो अतिरिक्त मूल्यांकन: कुछ मामलों में, किसी अंतर्निहित चिकित्सा स्थिति के संभावित प्रभाव का आकलन करने के लिए शारीरिक परीक्षा या प्रयोगशाला परीक्षणों का आदेश दिया जा सकता है।nnओ.सी.डी. का निदान केवल एक लाइसेंस प्राप्त मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर (मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक) द्वारा ही किया जा सकता है।